हरेली विशेष – छत्तीसगढ़ प्रदेश का पहला तिहार हरेली को माना जाता है, हरियाली का प्रतीक…

छत्तीसगढ़ का पहला तिहार हरेली आज याने 12 अगस्त को पूरे प्रदेश में बहुत ही हर्षोउल्लास एवं धूमधाम के साथ मानाया जा रहा है। कहा जाता है, कि समय में परिवर्तन होते रहता है, लेकिन प्राचीन परंपराएं सदैव जीवित रहती हैं और निरंतर उसकी भूमिका हमारे जीवन शैली में समाहित रहती है। वर्तमान डिजिटल और आधुनिक युग में समय बदल चुका है, लेकिन हमारी प्राचानी परंपराएं सदैव हमें हमारे बचपन की यादें और बडे-बुजूर्गो के द्वारा सिखाएं और सही रास्ते, धार्मिक तीज-त्योहार की प्रचलित परंपराओं से सदैव अवगत कराते आ रहे है। आज छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार हरेली बडे ही धूमधाम और उत्साह के साथ पूरे प्रदेश में मनाया जा रहा है, शहरों में यह त्योहार एक तरह से सिमट कर रह गया है, लेकिन प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में यह बडे ही धूमधाम और अत्यधिक हर्षोव्ल्लास के साथ मनाया जाता है, आज हरेली तिहार आते ही हमें भी अपने बचपन की यादें याद आती है, जब हरेली के दिन आज उंची और हवाई झूलों के दौर में भी रहचुली झूला की परंपरा छत्तीसगढ़ के लोग आज भी याद रखते हैं, जो हमें अपने ग्रामीण अंचल और पुरखों से जोड़ कर रखती है। हरेली के पावन अवसर पर रहचुली झूले पर चढ़ते हैं और याद करते हैं कि वर्तमान समय में मनोरंजन के माध्यम बदले हैं, लेकिन मनोरंजन नहीं बदला है। इस अवसर पर लोग रहचुली का आनंद लेते है। गेड़ी पर चढ़कर चलते हैं। क्राकीट सड़को से पहले के दिनों में जब ग्रामीण सड़कें बारिश के उफान में कीचड़ में तब्दील हो जाती थीं तब गेड़ी ही सबसे सुरक्षित जरिया होता था, ताकि कीचड़ से बच सकें। हरेली के मौके पर बारंबार गेड़ी चढ़कर सावन मास के उत्साह को जाहिर किया जाता है।
आईए जानते है, क्या होता है हरेली तिहार और क्यों मनाया जाता है-
छत्तीसगढ़ का पहला पारंपरिक त्योहार हरेली है, जिस पर किसान कृषि यंत्रों की पूजा करते है। इस अवसर पर किसान अपने घरों और खेत-खलिहानों में कृषि यंत्रों की पूजा के साथ ही पशुधन की भी पूजा की जाती है। प्रदेश के किसान इसे बडेÞ ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाते हैं। ग्रामीण अंचलों में हरेली के अवसर पर बैल भी सजते हैं और बैलगाड़ी भी सजती है। इसके साथ ही बैलदौड़ की प्रतियोगिताएं भी आयोजित किए जाते है। किसान अपने पशुधन के सम्मान और गौसेवा के लिए उनकी पूजा के लिए यह बड़ा पर्व होता है। खेती किसानी की तैयारियों के बीच धरती माता के अभिवादन का बड़ा त्योहार हरेली को माना जाता है। भारत के प्रत्येक प्रदेशों में यह त्यौहार अलग-अलग स्वरूपों में मनाया जाता है, लेकिन त्यौहार का प्रतीक वहीं होता है जो कि हरियाली का प्रतीक माना जाता है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का त्योहार है हरेली…
हरेली त्योहार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का त्योहार है। सावन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरेली पर्व मनाया जाता है। हरेली का आशय हरियाली ही है। वर्षा ऋतु में धरती हरा चादर ओड़ लेती है। वातावरण चारों ओर हरा-भरा नजर आने लगता है। हरेली पर्व आते तक खरीफ फसल आदि की खेती-किसानी का कार्य लगभग हो जाता है। छत्तीसगढ़ में हरेली हर जगह अपनी विशिष्ट सुंदरता और विशिष्ट रूपों तथा तरीकों से मनाई जाती है। प्रदेश का हर अंचल अपनी सांस्कृतिक सुंदरता के साथ अपने को व्यक्त करता है।

गेड़ी की पूजा के साथ ही होती है, दौड़ जैसी कई प्रतिस्पधार्एं आयोजित…
हरेली के अवसर पर प्रदेश में खेती-किसानी प्रारंभ होती है। इस दिन किसान खेती-किसानी में उपयोग में लाएं जाने वाले कृषि यंत्रों और उपकरणों की विशेष रूप से पूजा करते हैं और घरों में माटी पूजन होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गेड़ी चढेÞ बिना हरेली तिहार को अधूरा माना जाता है। हरेली के मौके पर ग्रामीण क्षेत्रों में खेल भी यादगार होते हैं। गांवों में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता सहित कई प्रतिस्पधार्एं भी आज के आयोजित की जाती हैं। छत्तीसगढ़ी की परंपरागत खेलों का जादू इस दिन उफान पर होता है। पूववर्ती कांग्रेस सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश के पहली तिहार हरेली को मुख्यमंत्री आवास में बडेÞ धूमधाम और उत्सव के साथ मनाने की शुरूआत किए थे जो आज भी परंपरा को बरकरार रखते हूए यह त्यौहार वर्तमान समय में भी मुख्यमंत्री आवास में मनाया जा रहा है, जहां छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खेलों जैसे पिट्ठूल, भौरा जैसे खेल विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे। साथ ही परंपरागत छत्तीसगढ़ी पकवान चीला, खुरमी, ठेठरी, अइरसा आदि का भी आनंद लेंगे। इस मौके पर सबसे खास लोक संस्कृति से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन है। राऊत नाचा, करमा नृत्य आदि छत्तीसगढ़ के परंपरागत नृत्यों का आयोजन होगा। इस अवसर पर विविध लोकगीतों की प्रस्तुति भी होगी।
हरेली के दिन बच्चे बांस से बनी गेड़ी का आनंद लेते हैं। पहले के दशक में गांव में बारिश के समय कीचड़ आदि हो जाता था उस समय गेड़ी से गली का भ्रमण करने का अपना अलग ही आनंद होता है। गांव-गांव में गली कांक्रीटीकरण से अब कीचड़ की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। हरेली के दिन गृहणियां अपने चूल्हे-चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाती है। किसान अपने खेती-किसानी के उपयोग में आने वाले औजार नांगर, कोपर, दतारी, टंगिया, बसुला, कुदारी, सब्बल, गैती आदि की पूजा कर छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुल भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते हैं। इसके अलावा गेड़ी की पूजा भी की जाती है।
हरेली तिहार में ये होती हैं रश्में…
छत्तीसगढ़ प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में अक्सर हरेली तिहार के पूर्व ही गेड़ी घरों में बनना शुरू हो जाता है। त्यौहार के दिन सुबह से ही तालाब के पनघट में किसान परिवार, बड़े बजुर्ग बच्चे सभी अपने गाय, बैल, बछड़े को नहलाते हैं। साथ ही खेती-किसानी, औजार, हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोते हैं। इसके अलावा घर के आंगन में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है। अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं। गांवों के ठाकुरदेव की पूजा की जाती है।
रच-रच की ध्वनि ही गेड़ी का आनंद…
हरेली तिहार के साथ गेड़ी चढ़ने की परंपरा अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सभी घरों गेड़ी का बनाया जाता है। परिवार के बच्चे और युवा गेड़ी का जमकर आनंद लेते है। गेड़ी बांस से बनाई जाती है। दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाई जाती है। एक और बांस के टुकड़ों को बीच से फाड़कर उन्हें दो भागों में बांटा जाता है। उसे नारियल रस्सी से बांधकर दो पउआ बनाया जाता है। यह पउआ असल में पैर दान होता है जिसे लंबाई में पहले कांटे गए दो बांसों में लगाई गई कील के ऊपर बांध दिया जाता है। गेड़ी पर चलते समय रच-रच की ध्वनि निकलती हैं, जो वातावरण को औैर आनंददायक बना देती है। इसके साथ ही शाम को युवा वर्ग, बच्चे गांव के गली में नारियल फेंक और गांव के मैदान में कबड्डी आदि कई तरह के खेल खेलते हैं। बहु-बेटियां नए वस्त्र धारण कर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो, फुगड़ी आदि खेल का आनंद लेती हैं।
छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का चखते हैं स्वाद…
हरेली के दिन गृहणियां अपने चूल्हे-चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाती हैं। इन व्यंजनों में ठेठरी, खुरमी, चीला, फरा,मुठिया, धुसका, चांउर रोटी अंगाकर, बफौरी सादा, चउँसेला, चांउर रोटी पातर, बफौरी मिक्स दाल आदि पकवान शामिल होते हैं। बच्चे, जवान, बूढ़े, महिलायें सभी लोग छत्तीसगढ़ी व्यंजनों और पकवानों का स्वाद बडे ही चाव से चखते हैं। और हरेली त्योहार का आनंद लेते हैं।





